Blog

बिहार ग्राम संसद: ग्रामीण विकास की दिशा में मजबूत कदम

73वें संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1992 के प्रावधानों के आधार पर बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 को हमने स्वीकार और अंगीकार किया है। इसके अधीन ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति एवं जिला स्तर पर जिला परिषद् का गठन किया गया है। लेकिन यह महसूस किया गया कि आजादी के बाद के लगभग चार दशकों एवं पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा देने के बाद लगभग तीन दशक लंबी इस विकास यात्रा के बावजूद भी हमारे गांव विकास की मुख्यधारा में उस तरह से शामिल नहीं हो पाए हैं जिस तरह से इन्हें होना चाहिए था।

योजनाओं और नीतियों के क्रियान्वयन में कहीं ना कहीं कुछ खामियां रही जिनकी वजह से 'ग्रासरूट डेमोक्रेसी' का स्वप्न हमारी आंखों से काफी दूर हो गया था। आज विज्ञान और टेक्नोलॉजी के युग में जहां शहर अंधाधुंध दौड़ और होड़ का हिस्सा बन चुके हैं, गांवों में आधारभूत विकास भी नहीं हो पाया है। कुछ गांव तो ऐसे हैं जहां अभी जीवन के लिए आवश्यक सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं है और लोग अभाव में जीने के लिए मजबूर हैं। हम सभी जानते हैं कि भारत का संपूर्ण विकास तभी संभव है जब गांवों का विकास हो क्योंकि आज भी भारत की अधिकांश आबादी ही नहीं भारत की आत्मा भी गांवों में बसती है।

'ग्राम संसद' की परिकल्पना पंचायती राज के सशक्तिकरण के लिए की गई है ताकि हर ग्रामवासी विकास की शीतल बयार को महसूस कर सके। दरअसल ग्राम संसद का विचार इस भावना से उपजा है कि स्वतंत्र भारत में गांवों का लोकतंत्रीकरण उतना नहीं हुआ है जितना होना चाहिए। यहां आज भी बहुत सी सीमाएं हैं, बाधाएं हैं जिनकी वजह से विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। ग्राम संसद प्रत्येक ग्रामवासी को विकास के मार्ग पर आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है और इसी मूल भावना के साथ ग्राम संसद की शुरुआत की गई है।

ग्राम संसद एक गैर-राजनीतिक मंच है। इसमें सबको साथ लेकर चलने और समग्र विकास को ध्यान में रखकर सुनियोजित तरीके से ग्रामीण विकास को प्राथमिकता देने की बात की गई है।बिहार ग्राम संसद का यह तीसरा फेज़ इस आशा के साथ शुरू किया गया है कि पूर्व के दोनों चरणों की तरह ही यह ग्रामीण विकास और स्वावलंबन की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

पंचायती राज अधिनियम के क्रियान्वयन में सबसे बड़ी जो बाधा उपस्थित हुई है, वह है - सरकार और ग्रामीण संस्थानों के बीच तालमेल में कमी। ग्राम संसद इन दोनों आधार स्तंभों को एक कड़ी के रूप में जोड़ते हुए काम करने में विश्वास रखती है। इस दृढ़ संकल्प में यदि स्थानीय ज्ञान और वैज्ञानिक विशेषज्ञता का मेल हो जाए तो समस्याओं के निवारण में विशेष मदद संभव हो सकेगी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए ग्राम संसद ने ग्रामीण विकास का मॉडल तैयार किया है और भारत में ग्राम संसद के इस क्रांतिकारी विचार की स्वीकार्यता बढ़ी है।

ग्राम संसद ने गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों पैमानों को अपने विकास के मॉडल का आधार बनाया है और यही कारण है कि बिहार ग्राम संसद के पहले दोनों फेज़ बेहद सफल रहे हैं और तीसरे चरण का आगाज भी नई उम्मीदें जगाता है। आज सपनों को पंख लग गए हैं क्योंकि इन्हें साकार करने के लिए बहुत से कदम एक साथ चल पड़े हैं। ये कारवां विशाल जनसमूह का रूप ले चुका है जो मन में नवीन आशा और उमंग का संचार करता है।

गांवों की गतिविधियों से जुड़ी सूचनाओं को आप तक पहुंचाने के लिए और देश दुनिया में हो रहे नवाचारों से आपको अवगत कराते रहने के लिए शब्दों के मोतियों को हमने अपनी मैगजीन में संजोया है। हम उम्मीद करते हैं कि जिस तरह बिहार ग्राम संसद को आपका भरपूर प्यार और समर्थन मिला है वैसा ही स्नेह हमारी मैगजीन को भी मिलेगा।

शुभकामनाओं के साथ।